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क्रूड ऑयल पहुंचा 90 डॉलर के पार! भारतीय इकोनॉमी पर असर बेशुमार, समझिए कैसे

भारत, दुनिया में कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार है. ऐसे में महंगा आयात, चालू खाते के घाटे को बढ़ा सकता है और इकोनॉमी की रफ्तार धीमी कर सकता है.
BQP Hindiपल्लवी नाहाटा
BQP Hindi05:06 PM IST, 07 Sep 2023BQP Hindi
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कच्चे तेल की कीमतों में मौजूदा तेजी इस समय देश के लिए कोई बड़ा खतरा तो पैदा नहीं कर रही, लेकिन कीमतें लगातार बढ़ती रहीं तो देश के आर्थिक विकास की रफ्तार पर इसका प्रभाव पड़ सकता है.

OPEC+ देशों (Organization of the Petroleum Exporting Countries) की ओर से उत्‍पादन में कटौती के फैसले को 'तीन और महीने' के लिए बढ़ाए जाने के बाद, ब्रेंट क्रूड 5 सितंबर को 90 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गया, जो पिछले साल नवंबर के बाद सबसे अधिक है. ये अभी भी उसी लेवल के करीब चल रहा है.

भारत, दुनिया में कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार है. ऐसे में महंगा आयात, चालू खाता घाटा और बढ़ा सकता है और इकोनॉमी की रफ्तार धीमी कर सकता है. हालां‍कि कुछ ऐसे फैक्‍टर्स भी हैं, जो इकोनॉमी को सहारा देते हैं.

चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ने का डर

बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री दीपानविता मजूमदार ने कहा, चूंकि भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का 80% से अधिक आयात करता है, इसलिए इसका असर करंट अकाउंट डेफिसिट और रुपये पर पड़ेगा. उन्होंने कहा, 'चालू वित्त वर्ष में जुलाई तक इनबाउंड ऑयल शिपमेंट 55 बिलियन डॉलर का था और घरेलू सुधार के साथ, ये निर्भरता जारी रहेगी.

मजूमदार ने कहा, 'हमारा अनुमान है कि 80-85 डॉलर प्रति बैरल की बेस लाइन से स्थायी आधार पर तेल की कीमतों में प्रत्येक 10% की बढ़ोतरी के लिए, तेल आयात बिल 15 बिलियन डॉलर या GDP का 0.4% बढ़ने की संभावना है.' उनके मुताबिक, इसका असर ऊंचे CAD पर पड़ेगा और रुपये पर दबाव बन सकता है.

IDFC फर्स्ट बैंक की इकोनॉमिस्ट गौरा सेन गुप्ता ने कहा, 'अगर वित्त वर्ष 2024 के बाकी बचे समय में कच्चे तेल की कीमतें औसतन 90 डॉलर प्रति बैरल होती हैं, तो CAD अनुमानित 1.8% के मुकाबले GDP का 1.9% तक बढ़ सकता है, ये मानते हुए कि इसी अवधि में इंडियन बास्केट का औसत 85 डॉलर प्रति बैरल है.'

उन्होंने कहा, 'अगर कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल पर बनी रहती हैं तो हम अपने अनुमान में सीमित बढ़ोतरी का जोखिम देखते हैं.'

विदेशी मुद्रा भंडार

गौरा सेन गुप्ता ने कहा, 'निकट अवधि में, डॉलर की मजबूती बनी रहने की उम्मीद है. कच्चे तेल में बढ़ोतरी का असर रुपये जैसी नेट इंपोर्टिंग करेंसीज पर भी पड़ेगा, ये कमजोर होंगी.'

बहुत कुछ RBI के विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप (Forex Intervention) पर निर्भर करता है, जिसका उद्देश्य दोनों पक्षों (एप्रिसिएशन और डेप्रिसिएशन) में अस्थिरता को सीमित करना है. उन्होंने कहा, दिसंबर तक डॉलर-रुपये की जोड़ी 82-84 के बीच सीमित रहने की उम्मीद है.'

महंगाई

दीपानविता मजूमदार ने कहा, 'जब खाद्य कीमतें ऊंची होती हैं, तो घरेलू रिटेल पंप पर कीमतों में ज्यादा बदलाव की संभावना नहीं होती है, बशर्ते तेल की कीमत का झटका लगातार नहीं रहे तो.'

उन्होंने कहा, 'शेष अंतर को सरकार इंपोर्ट ड्यूटी में बदलाव करके पूरा कर सकती है, जिसका कुछ वित्तीय प्रभाव हो सकता है.'

गौरा सेन गुप्ता ने भी कहा कि तेल की बढ़ती कीमतों से महंगाई के जोखिम की संभावना नहीं है क्योंकि कच्चे तेल में अस्थिरता के बावजूद मई 2022 से घरेलू पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं हुई थी.

उन्होंने कहा, 'हमें उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2024 में CPI इंफ्लेशन औसतन 5.8% रहेगा, ये मानते हुए कि घरेलू रिटेल पेट्रोल और डीजल की कीमतें मार्च 2024 तक वर्तमान स्तर पर बनी रहेंगी.'

CPI बास्केट में पेट्रोल और संबंधित प्रोडक्ट्स का वेटेज 2.4% है.

मजूमदार ने कहा, 'कच्चे तेल में 10% की वृद्धि का सीधा असर CPI पर 15 बेसिस प्वाइंट है. इस पास-थ्रू का इनडायरेक्ट इंपैक्ट चालू वित्तीय वर्ष में CPI के लिए 5.5% के हमारे बेसलाइन पूर्वानुमान में 25 से 35 बेसिस प्वाइंट का जोखिम पैदा कर सकता है.'

सेन गुप्ता का अनुमान है कि हाल ही में घोषित घरेलू गैस सिलिंडर की कीमतों में 200 रुपये कटौती से सितंबर में महंगाई के दबाव में 20 से 30 बेसिस प्वाइंट की मामूली कमी आने की उम्मीद है.

हालांकि, WPI बास्केट पर प्रभाव अधिक स्पष्ट है क्योंकि कच्चे तेल से संबंधित प्रोडक्ट्स का वेटेज इसमें 7.3% है. मजूमदार के अनुसार, इस प्रकार, मौजूदा स्तर से 10% की वृद्धि लगभग 100 बेसिस प्वाइंट तक का जोखिम पैदा कर सकती है.

ग्रोथ

कच्चे तेल की ऊंची कीमतें नेट इंपोर्ट पर दबाव बढ़ाकर GDP ग्रोथ को धीमा कर देती हैं. निर्मल बंग इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की इकोनॉमिस्ट टेरेसा जॉन ने कहा कि तेल की कीमतों में करीब 10 डॉलर प्रति बैरल की निरंतर वृद्धि से GDP ग्रोथ में करीब 20 बेसिस प्वाइंट की गिरावट आती है.

उन्होंने कहा, 'हालांकि, ये देखते हुए कि कच्चे तेल की कीमतों में मौजूदा बढ़ोतरी उच्च मांग की बजाय आपूर्ति में कटौती से प्रेरित है, ये लंबे समय तक कायम रहने की संभावना नहीं है.'

टेरेसा जॉन को कच्चे तेल के महंगे होने से भारत के मैक्रो फंडामेंटल के लिए किसी बड़े जोखिम की आशंका नहीं है, जब तक कि ये लंबे समय तक बरकरार न रहे.

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